यात्रा संस्मरण नहीं, यात्रा के दौरान हुई बेहद निजी अनुभूतियाँ, हृदय के भाव, जिन्हे कार्यालय के अनेक लोगों के उत्साहवर्धक तथा जिज्ञासापूर्ण प्रश्नों से प्रेरित होकर, शब्दों की सहायता से अभिव्यक्त करने का दुस्साहस कर रहा हूँ। उम्मीद करता हूँ कि इसे पढ़ने वाले मुझे समझेंगे तथा लेखन में झलकने वाली अपरिपक्वता के लिए मुझे क्षमा करेंगे।
सतीश नारायण कोटियन
2 जून 1986 …………… नहीं! यह अनावश्यक सा लगता है। वैसे भी सब कुछ तिथिवार, ब्यौरेवार लिख पाना अत्यंत कठिन होगा और लिखने के लिए इतना कष्ट उठाना मेरा स्वभाव भी नहीं है। हृदय-उद्गम स्थल से सहज, स्वभाविक रूप से जो भाव शब्दों में परिवर्तित होकर पंक्तिबद्ध रूप से प्रवाहित होते हैं, उन्हे ही कागज पर उतार देना भी अक्सर जहमत मालूम पड़ती है। कितना कुछ तो यूँ ही प्रवाहित होकर कहीं अज्ञात में विलीन होकर रह जाता है। सोचता हूँ कभी उस अंजान क्षितिज को पाऊँ जहाँ शब्दाभिव्यक्त भाव-सरिता जाकर विलीन होती है, तो एक अथाह, असीम सागर को पाऊँ।
लेकिन, 2 जून 1986 ……………….. मैं नहीं जानता था कि हम इतने विख्यात हैं, इतने सारे लोग हमें विदा करने आए थे कि एक आश्चर्य मिश्रित मीठी खुशी हृदय में कहीं गहरे उतरकर बार-बार गुदगुदा रही थी। हाँ! उस भाव-भीनी विदाई समारोह में, शंकाओं का वह भूत भी मुझसे दूर चला गया था जो अभियान पर निकलने से कुछ दिन पूर्व से मुझ पर बुरी तरह हावी था। उस एक की कमी भी साल नहीं रही थी जिससे दूर होना उतना ही कष्टदायी था जितना कि उसके समीप होना।
एक और बात जो मुझे प्रिय नहीं थी, हमारे अभियान का उद्देश्य – विभिन्न राज्यों में, वहाँ के लोगों को शांति, मैत्री तथा राष्ट्र की अखंडता को बनाए रखने का संदेश पहुँचाना, जिसकी चर्चा होने पर लोगों की प्रतिक्रिया कुछ यूँ होती थी, “हाँ! अभियान का उद्देश्य ऐसा ही कुछ होना चाहिए जिससे यह लगे कि अभियान पोलिटिकली मोटिवेटेड है। बिना किसी पॉलिटिकल मोटिवेशन के तो तुम्हारा यह अभियान असफल ही होना था………………….” हृदय क्षुब्ध हो उठता था। लगने लगा था जैसे देश के कुछ हिस्सों की स्तिथियों की अस्थिरता का लाभ उठाने जा रहे हों हम………………। लेकिन, हमारी आवश्यकता थी कहाँ? हर राज्य में, छोटे से छोटे ग्राम का एक नितांत अशिक्षित व्यक्ति भी कितनी सहृदयता से बर्ताव करता था। अपनी मूर्खता पर हँसी आने लगी थी। हम उन्हे जोड़ने चले थे जो हमसे कंही भी अलग नहीं थे। दरअसल हम उन राज्यों से सैकड़ों मील दूर बैठकर, उन राज्यों का एक अजीब ही खाका अपने मन में खींच लेते हैं और सोच लेते हैं कि वंहा सभी कुछ अव्यवस्थित है, असुरक्षित है, जबकि यथार्थ ठीक इसके विपरीत होता है। दूरी तथ्यों को बदल देती है।
हाँ! एक बात अपरोक्ष रूप से परिलक्षित होती है। वे अपने राज्य, अपने संस्कारों की एक निजी महत्ता को सुरक्षित पाकर ही भारतीय होने में गौरव का अनुभव करते हैं। उस निजी महत्ता को कंही भी ठेस पहुँचने पर वे भड़क उठते हैं जिसे स्वाभाविक कहना अनुचित नहीं होगा।
पहाड़! पहाड़ मुझे हमेशा लुभाते रहे हैं। धीर-गंभीर, विशाल और उदार (पता नहीं क्यों?) शुरू के कुछ दिन अत्यंत कठिन गुजरे। इसलिए नहीं कि सुबह से शाम तक निरंतर मोटरसाइकल चलाते रहने की आदत नहीं थी बल्कि इसलिए कि यात्रा अत्यंत नीरस थी। बेहद गर्मी पड रही थी और आसपास का वातावरण शुष्क प्रतीत होता था। ……………………… पहाड़! एक तेज रफ्तार से, सीधी सपाट सड़कों पर, निरंतर भागती हुई मोटरसाइकल पर बैठे रहने की नीरसता, शुष्कता में बंधा सा, जकड़ा सा मन – जैसे एकाएक ही एक मधुर, कोमल आघात पाकर, उस नीरस शुष्क बंधन-जकड़न से मुक्त होकर, मोटरसाइकल की रफ्तार से कंही अधिक रफ्तार से उड़कर किसी सुदूर स्तिथ पर्वत शिखर पर जा लेटता है, और गहरी गहरी साँसें लेने लगता है। देखता है एक निर्मल आकाश, जिस जगह पर वह लेटा है, उस स्थान की पवित्रता का बोध कर आल्हादित होता है। अनुभव करता है अनछुई हवा का मृदुल स्पर्श………………. या फिर जा भटकता है पर्वत श्रेणी के बीच गहरी उपत्यकाओं में और पुकार उठता है किसी का नाम…………………, फिर अपनी ही पुकार की अनुगूँज से रोमांचित हुआ दौड़ पड़ता है उस उन्मादिनी निर्झरिणी की ओर जो हर अवरोध की उपेक्षा कर बही चली जाती है – उन्मुक्त, उच्छ्रंखल…………………, अंजुली में पानी भरकर वह आकाश में उछाल देता है – अनगिनत छोटी-छोटी बूंदें – आकाश हँस देता है, किरणों का आलोक और प्रखर हो उठता है………………………..असीम आनंद, असीम तृप्ति………………….
एक और आघात, सामने रेल्वे क्रासिंग है, जिसके फाटक बंद हैं। मन फिर बंदी हो जाता है नीरसता, शुष्कता में। जानता हूँ कि हर कोमल आघात जो मन की एकाग्रता भंग कर उसे उड़ा ले जाते हैं दूर – व्यवधान है, व्याघात है…………….लेकिन………………….मन नीरसता, शुष्कता से उभर कर किसी तरलता का स्पर्श कर लेता है…….. तो अच्छा लगता है और जो अच्छा लगता है वह बुरा नहीं लगता।
पहाड़ अभी भी हमसे सैकड़ों किलोमीटर दूर थे। यह नहीं कि सम्पूर्ण यात्रा में केवल पहाड़ी क्षेत्र ही मनोरम लगे। मैदानों में भी अनेक ऐसे रमणीय स्थल मिले जंहा का अप्रतिम प्राकृतिक सौंदर्य देखकर मन ललक उठता था और इच्छा होती थी कि कुछ दिन वंही ठहर जाएँ किन्तु…………..हमने तय किया था कि अभियान कार्यक्रम की नियोजित अवधि से अधिक समय किसी स्थान विशेष को नहीं देना है, अत: बढ़ते रहे…………………..।
मैदानी यात्रा की एक ऐसी ही शाम। हम पूर्व दिशा की ओर अग्रसर थे। मोटरसाइकल के रियर व्यू मिरर में अस्ताचलगामी सूर्य, किसी अत्यंत सुंदर, लज्जा से लाल हुए चेहरे के माथे की सिंदूरी बिंदी सा दिखाई दे रहा था। …………………….. बरबस ही कवि गुलज़ार की वह नज़्म याद आ गई जंहा कवि शाम को तालाब के किनारे खड़ा होकर कल्पना करता है कि डूबता हुआ सूरज जो सुर्ख-सुनहरी रोगन बिखेर रहा है उसे अपने हाथों में पोंछ कर, चुपके से, एक बार अपनी प्रेयसी के गालों पर छप से मल दे………………लेकिन हर रोज़ वह सुर्ख गुलाल, तालाब के मटियाले पानी में घुल कर रह जाता है………………………..। एक खूबसूरत खयाल की बदरंग परिणति। रियर व्यू मिरर में देखता हूँ, मोटरसाइकल की रफ्तार बढ़ा देने के कारण वह बुरी तरह कंपायमान है और अस्त होता सूर्य जो सिंदूरी बिंदी सा दीख पड रहा था, अब बुरी तरह छितरा कर रह गया है……………..एक खूबसूरत ख्याल की बदरंग परिणति की तरह।
रात हो चली है। हम जिस ओर अग्रसर हैं उस ओर देखने पर यूँ प्रतीत होता है मानो सर्वत्र अंधकार किसी विजयी सेना की तरह पश्चिम की ओर बढ़ा जा रहा हो। पश्चिमी क्षितिज में दिन, रौशनी की एक पतली सी लकीर सा दीख पडता है, थकाहारा, क्लांत, रात की गोद में पनाह लेता हुआ सा। मैं और मेरे ख्याल, दोनों बुरी तरह थक चुके होते हैं और हम रात व्यतीत करने के किसी ठिकाने की तलाश में होते हैं। रात बिताने के लिए हमने अक्सर सरकारी विश्राम गृहों अथवा लोक निर्माण विभाग के निरीक्षण बंगलों की पनाह ली है। बहुत कम ऐसा हुआ है कि हम होटलों में रुके हों।
शेष फिर कभी……..
